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सत्य का साक्षात्कार , धन्य हुई बैशाख पूर्णिमा।
May 7, 2020 • तहलका ब्यूरो • अध्यात्म

सत्यनारायण गोयनका,विपश्यना आचार्य।

सत्य का साक्षात्कार , धन्य हुई बैशाख पूर्णिमा।

वैशाख पोर्णिमा की वह मंगलमयी रात धन्य हो उठी ,जबकि उस युवा योगी सिद्धार्थ गौतम ने बोधिवृक्ष के तले अपने आप पर अनुपम विजय प्राप्त कि । सारा अज्ञान अंधकार दूर हो गया । प्रज्ञा की आलोक रश्मियां प्रभास्वर हो उठीं । सूक्ष्म से सूक्ष्म आंतरीक क्लेशों का मैल धुप - धुल गया । नितांत विरजविमल धर्मचक्षु प्राप्त हो गये । अनेक जन्मों के पूर्व संस्कारों का सारा लेप उतर गया । अंतर्मन पूर्णतया निर्मल निर्लेप हो गया । सभी कर्म बंधन टूट गये । चित्त सर्वथा बंधन - मुक्त हो गया । भविष्य के प्रति कोई तृष्णा नहीं रह गयी । मन पूर्ण रूपेन वितृष्ण हो गया । मोह - मुढता, माया - मरचिका, विभ्रम - विपल्लास का सारा कुहरा दूर हो गया । परम सत्य का साक्षात्कार हो गया । अनंत जन्मों का सत्प्रयत्न सफलीभूत हुआ । बोधिसत्व सिद्धार्थ गौतम सम्यक सम्बुद्ध हो गया ।
अनुपम विमुक्ति रस का आस्वादन करते ही सम्यक सम्बुद्ध के मुँह से परम हर्ष के उद्गार निकल पडे । बड़े अर्थपूण हैं ये उदान शब्द ! बड़ा भावपूर्ण है यह ह्रदय उद्गार !
अनेकजातिसंसारं सन्धाविस्सं अनिब्बिसं । गहकारं गवेसन्तो दुक्खा जाति पुनप्पुनं ।।
गहकारक ! दिट्ठोसि पुन गेहं न काहसि । सब्बा ते फासुका भग्गा गहकूटं विसडृतं । विसड्रृारगतं चित्तं तण्हानं खयमज्झागा ।।
( इस काया - रूपी ) घर को बनाने वाले की खोज में ( मैं ) बिना रुके अनेक जन्मों तक (भव-) संसरण करता रहा, किंतु बार बार दुःख (-मय ) जन्म ही हाथ लगे ।
ऐ घर बनाने वाले ! (अब ) तू देख लिया गया हैं, ( अब ) फिर ( तू ) ( नया ) घर नहीं बना सकता । तेरी सारी कड़ियां टूट गयी हैं और घर का शिखर भी विशृंखलित हो गया हैं । चित्त पुरी तरह संस्काररहित हो गया हैं और तृष्णाओं का क्षय ( निर्वाण ) प्राप्त हो गया है ।
सम्यक सम्बोधि प्राप्त करने के पूर्व ध्यान समापत्तियों द्वारा जो अनेक सिद्धिया प्राप्त हुईं, उनके बल पर सिद्धार्थ गौतम ने अपने अनंत अतीत का दर्शन किया और देखा कि उस अपरिमीत काल - प्रवाह में अनगिनत बार इस संसार में जन्म लेता ही रहा हूँ । हर बार जन्म लेने पर मृत्यु की और ही दौड़ लगती रही हैं । यह कौन हैं जो मुझे बार - बार जन्म दे रहा हैं ? यह कौन हैं जो हर मृत्यु पर मेरे लिए एक नया जीवन तैयार करता हैं ? एक नया घर बना देता हैं ? इस घर बनाने वाले की खोज में कितने जन्मों में कितना समय बिताया और इस खोज में बार - बार दुःखमय जन्म ही लेते रहने पड़े । इस बार ऐसी सम्यक सम्बोधी प्राप्त हुईं सारी सच्चाई आंखों के सामने आ गयी । देख लिया उस घर बनाने वाले को । अब वह पुनः घर नहीं बना सकेगा मेरा । घर बनाने के लिए जिन सामग्रियों की आवश्यकता होती हैं , वे सारी नष्ट भ्रष्ट कर डाली हैं मैंने । घर बनाने वाला अब किससे घर बना पायगा । बिखर गयी घर की सारी कडीयां , बिखर गया घर का शिखर स्तंभ । अब कोई आधार नहीं नये घर के बनने का । संस्कारों से पुूर्णतया विहीन होकर परम परिशुद्ध हो गया यह चित्त । इस पर लगे हुए अतीत के सारे लेप उतर चुके । आगे कोई लेप लगने की संभावना नहीं । क्योंकि भविष्य के प्रति मन मे अब कोई कामना ही नहीं रह गयी । सारी तृष्णाएं जड़ से उखाड़कर फेंक दी गयीं काम तृष्णा भी , भव तृष्णा भी , विभव तृष्णा भी ।
कौन था यह घर बनाने वाला जिसका दर्शन हो गया सम्यक संम्बुद्ध को ? विमुक्ति के इस संग्राम के दौरान उस रात उसे देवपुत्र मार ( मृत्यु राज ) ही के दर्शन हुए थे । क्या यही मार ( मृत्यु राज ) घर बनाने वाला हैं ? कौन हैं यह मार ? हमारे अंतर्मन में समाए हुए सभी प्रकार के कुत्सित संस्कारों का व्यक्तिकरण ही तो मार है जो की बार - बार हमारे लिए नया - नया घर बनाता रहता है । नए - नए जन्म द्वारा नया - नया शरीर उत्पन्न करता रहता हैं । लेकिन अब यह मार ( मृत्यु राज ) सर्वथा लाचार हो गया , निहत्था हो गया , निर्बल हो गया । अब यह कैसे घर बना सकेगा भला ! घर बनाने की सारी सामग्री यानी सारा पूर्व संंचित संस्कार सचमुच ही छिन्न - भिन्न हो गया । नया संस्कार बनाने वाली सारी लालसाएं जड़ से उखड़ गयी । भूतकाल के संग्रहीत संस्कार और भविष्य के प्रति जागने वाली तृष्णाएं ही तो हमारे लिए नए - नए भव का कारण बनती हैं । ये दोनों खत्म हो जायँ तो नया भव बनना रुक जाय । आग का जलावन समाप्त हो जाय तो आग अपने आप बुझ जाय । बिना जलावन आग किसको लेकर जले ?
'' खीणं पुराणं नवं नत्थि सम्भवं" पुराना क्षीण हो गया , नया बन नहीं रहा । यहीं तो विमुक्त - अवस्था थी । यही तो सम्यक सम्बोधि थी उस बोधिसत्व की । यही तो अंधकार पर प्रकाश की विजय थी । मृत पर अमृत की विजय थी । असत पर सत की विजय थी ।
परंतु सिद्धार्थ गौतम की इस अनुपम उपलब्धि की बात सुनकर हम प्रसन्न - विभोर हो उठें और धन्य धन्य कह उठें तो मात्र इतने से हमारा कोई विशेष लाभ हो जाने वाला नहीं हैं । हमारा वास्तविक लाभ तो स्वयं बोधि प्राप्त करने में है , स्वयं परमं सत्य का साक्षात्कार करके विमुक्त हो जाने में हैं । , अतः सिद्धार्थ गौतम की इस महान आत्म - विजय से हम समुचित प्रेरणा प्राप्त करें और स्वयं भी उस रास्ते चलकर , भले थोड़ी बहुत ही सही , इसी जीवन में चित्त - विमुक्ति प्राप्त करें तो ही हम सच्चे सुख के अधिकारी हो सकते हैं । इसलिए समझें कि सिद्धार्थ गौतम की सम्यक संम्बोधि क्या थी ? और कैसे हासिल हुई ?
यह कोई अलौकिक चमत्कारपूर्ण घटना नहीं थी जो कि किसी अदृश्य सत्ता की अनुकम्पा स्वरूप घटी हो । यह तो मनुष्य के अपने ही अथक परिश्रम की श्रेष्ठतम उपलब्धि थी , किन्हीं कमनीय कपोल कल्पनाओं के सहारे प्राप्त हुआ, यह कोई थोथा बुद्धि किलोल नहीं था और न ही किसी प्रकार की अंधभक्ति का निरर्थक भावावेश था । यह तो सम्यक सम्बोधी थी , परम सत्य का प्रत्यक्ष साक्षात्कार था । इसे प्राप्त करने के लिए मिथ्या कल्पनाओं का सहारा नहीं लिया गया और नहीं मिथ्या भावुकता का । मस्तिष्क और हृदय को इन दोनों दूषणों से दूर रख कर ही नितांत निर्मलता प्राप्त की जा सकी। मस्तिष्क ने अपरिमित शुद्ध ज्ञान हासिल किया और हृदय ने भावावेश की मलीनतासे विहीन अनंत विशुद्ध मैत्री और करुणा उपलब्ध की । और यह सब स्वावलंबन के बल पर ही किया । पराश्रित होकर कोई स्वतंत्र और स्वाधीन कैसे हो सकता है ? विमुक्त कैसे हो सकता हैं ? मनुष्य को अपने भितर की लड़ाई स्वयं ही लड़नी पड़ती है । अपने दुर्गुणों से और अपनी मीथ्या दृष्टियों से स्वयं ही युद्ध करना पड़ता है । इसी लड़ाई में अज्ञान के घने बादल छिन्न - भिन्न होते हैं और उस अंधकार में से सत्य का प्रकाश प्रस्फुटित होने लगता है ।
सत्य की खोज में लगा हुआ साधक अंतर्मुखी होकर यह जान लेता है कि उसके भीतर ही भीतर क्या कुछ हो रहा है और जो कुछ हो रहा है उसका यह - यह कारण हैं । वह जान लेता है कि जो कुछ कारणों से हो रहा हैं , उसका निवारण अवश्य किया जा सकता है । वह जान लेता है कि इस - इस प्रकार उन - उन कारणों का निवारण किया जा सकेगा और ऐसा जान समझकर ही वह उन कारणों का स्वयं निवारण करके बंधन मुक्त होता हैं और निरभ्र आकाश में चमकते हुए सूर्य के समान प्रभास्वर हो , प्रतिष्ठित होता हैं । यही सच्ची विमुक्ति हैं ।
अनेक जन्मों में और इस अंतिम जन्म में भी अनेक प्रकार की विधियों के अभ्यास में भटकते रहने के बाद उस महामानव ने इसी विमुक्ति के लिए जो सहज सरल तरीका ढूंढ निकाला उसे ही हमारे लिए विरासत के रूप में छोड गये । हम उसका सही उपयोग करके वही प्राप्त कर सकते हैं जो उन्होंने प्राप्त किया।