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आपदाकाल में सरकार के साथ खड़ा है भारत का समाज: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
July 18, 2020 • तहलका ब्यूरो • राष्ट्रीय

आज पूरा विश्व कोरोना महामारी के संकट से जूझ रहा है। भारत में इस संकट से लड़ने में समाज की एक बड़ी भूमिका रही है। आपदा की कसौटी पर सरकार और समाज से जुड़े अलग-अलग पक्षों को समझने के लिए इंडिया फाउंडेशन द्वारा समाज व सरकार में विभिन्न स्तरों पर काम करने वाले लोगों से चर्चा की एक श्रृंखला आयोजित की जा रही है। 
ध्यान देने योग्य है कि आपदाकाल में सहयोग, समन्वय और समाधान का बड़ा उदाहरण प्रस्तुत कर हुए, भारतीय समाज की एकता, चेतना व शक्ति का प्रतीक रूप में नेतृत्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने किया।
चर्चा के क्रम में संकट के समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य, समाज की भूमिका, सरकार की नीतियों तथा आने वाले समय पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह श्री भय्याजी जोशी से विस्तृत वार्ता हुई। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के संपादित अंश –
- कोरोना संक्रमण के कालखंड में रा. स्व. संघ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत के समाज ने भी इस पर अलग तरीके से प्रतिक्रिया दी है। आप इस परिदृश्य को कैसे देखते हैं?
सभी जीवित मनुष्यों ने इस प्रकार का महामारी का संकट पहली बार देखा है। लेकिन हम सब जानते हैं कि संघ के स्वयंसेवकों का अपना एक स्वभाव है कि जैसी आपदा होगी, उस आपदा को समझकर उसमें से रास्ता निकालते हुए, अपेक्षाओं को समझते हुए जो काम करना है, उसे हम हमेशा से करते आए हैं।
कोरोना संक्रमण के शुरू में परिस्थिति को देखते हुए भारत सरकार ने लॉकडाउन करने का निर्णय लिया तो कई प्रकार के प्रतिबंध आए। जिनका जीवन रोज की कमाई पर चलता है, ऐसे बंधुओं के सामने जीवन-मरण का प्रश्न खड़ा हुआ। इसे ध्यान में रखते हुए संघ कार्यकर्ताओं ने यह प्रयास प्रारंभ किया कि पहले उन बंधुओं के लिए कम से कम भोजन तो उपलब्ध हो जाए। दूसरा, एक अन्य संकट बाद में ध्यान में आया, वह यह कि रोज की कमाई बंद होने के कारण जो एक आर्थिक संकट खड़ा हुआ, उसे देखते हुए सोचा गया कि उनको कम से कम कुछ दिनों के लिए राहत मिले, इस नाते भोजन पैकेट के अलावा उनके लिए कम से कम, महीने भर के लिए कुछ अनाज-राशन उपलब्ध हो जाए। यह बात जब सामने आई तो देश भर के सभी जिलों में तुरंत भोजन पैकेट और जीवनावश्यक वस्तुएं उपलब्ध कराने की दिशा में स्वयंसेवकों ने और प्रयास शुरू किए। मैं समझता हूं कि लगभग 2,00,000 से अधिक कार्यकर्ता इसमें लगे और एक करोड़ परिवारों तक भिन-भिन्न प्रकार की सामग्री पहुंचाने का काम किया गया।
प्रारंभिक दिनों में इस प्रकार की आवश्यकता थी। उसके बाद परिस्थितियां बदलती गईं और कुछ राज्यों से प्रवासी मजदूरों में अपने-अपने गांव की ओर जाने की बात चली। उस समय शासन भी व्यवस्थाओं के बारे में सोच रहा था, परंतु व्यवस्था हो नहीं पाई थी और इसलिए लोगों ने जब पैदल चलना प्रारंभ किया तो एक बहुत दुखद परिस्थिति हम सबके सामने आई। अपने निजी सामान को लेकर, बच्चों को लेकर बड़ी आयु के पुरुष और महिलाएं भी अपने गांव पहुंचने की इच्छा से जब चल पड़े तो हमको लगा कि यह तो बड़ी कठिन परिस्थिति निर्माण हो रही है। इसलिए सोचा गया कि जिन-जिन रास्तों से वे जा रहे थे, उन रास्तों पर उनके लिए कुछ न कुछ व्यवस्थाएं खड़ी की जाएं, प्रवासी मजदूरों को स्थान-स्थान पर भोजन मिले और उनकी जो आवश्यकताएं थीं, जैसे उदाहरण के लिये मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र से निकले मजदूरों की मध्य प्रदेश आते-आते चप्पलें भी टूट गई थीं तो बहुत बड़ी मात्रा में चप्पल वितरण का भी काम स्वयंसेवकों ने उस समय किया। कई यात्री बीमार भी हो जाते थे, चिकित्सकों की आवश्यकता रहती थी, इनके लिए चिकित्सकों की, दवाइयों की व्यवस्था करना, इस प्रकार का एक बड़ा काम चला। मैं समझता हूं कि 30-40 दिन इस प्रकार का काम चला। बाद में शासन ने रेल की व्यवस्था की तो मजदूरों ने अपने-अपने क्षेत्र में वाहनों से जाना प्रारंभ किया। उसमें भी एक सहयोग रहा। एक प्रकार का और एक सहयोग, जो हमको लगा कि करने की आवश्यकता है, वह था कि शासन ने जो व्यवस्थाएं बनानी शुरू कीं, तो उसमें प्रवासी मजदूरों का पंजीकरण एक बहुत बड़ी समस्या थी। कई स्थानों पर संघ के स्वयंसेवकों ने शासन के अधिकारियों से बात करके प्रवासी मजदूरों के पंजीकरण में शासन का सहयोग करना शुरू किया। मैं समझता हूं कि यह काम देश के अलग-अलग स्थानों पर बड़ी मात्रा में हुआ है। और जब दिन आगे बढ़ते गए तथा समस्याएं अलग-अलग प्रकार का रूप लेने लगीं, तब हमको लगा कि ऐसे तो कितना भी करें, जब तक समाज का सहयोग नहीं मिलता है, तब तक शासन का प्रभावी रूप से काम करना कठिन होगा। यह सोचकर स्थान-स्थान की शासन व्यवस्थाओं में विभिन्न कामों के लिए स्वयंसेवक मतलब 'वॉलंटियर्स' उपलब्ध कराने की चर्चा होती गई और स्थान-स्थान पर सब प्रकार का काम शुरू किया।
इसे मैं प्रसन्नता की बात तो नहीं कहूंगा, परंतु कह सकता हूं कि यह हमारे कार्यकर्ताओ का साहस है। सब प्रकार का खतरा मोल लेते हुए और कोरोनाग्रस्त क्षेत्रों में, जिसको यहां पर बड़ा संक्रमण-प्रभावित क्षेत्र माना गया है, ऐसे क्षेत्रों में जाकर भारत के स्वास्थ्य कर्मियों को पूरा सहयोग करने का काम कई स्थानों पर स्वयंसेवकों ने प्रारंभ किया। इसमें खतरा था, ये भी रोग से संक्रमित हो सकते थे, परंतु किसी प्रकार का भी स्वयं का विचार न करते हुए, इस आवश्यकता को ध्यान में लेकर स्वयंसेवक निकले और कोरोना परीक्षण के काम में वे सब पीपीई किट पहनकर थोड़ी ट्रेनिंग लेकर, विशेषत: दिल्ली, मुंबई, पुणे....ऐसे क्षेत्रों में तो मैं कहूंगा कि बहुत बड़ी मात्रा में कार्यकर्ताओं ने उन घनी बस्तियों में जाकर परीक्षण करने में पूरा सहयोग दिया जो एक बड़ी बात है। मैं एक उदाहरण और देना चाहूंगा। दिल्ली में अलग-अलग प्रकार की 'हेल्पलाइन' बनाई गई थीं। उसमें विशेषत: ईशान्य भारत से, उत्तर पूर्व के क्षेत्र से जो बड़ी संख्या में लोग दिल्ली में रहते हैं, उनकी कुछ समस्याएं थीं, तो उनके लिए एक हेल्पलाइन शुरू की थी। जिसका बहुत बड़ा लाभ उत्तर-पूर्व भारत के छात्रों को दिल्ली में हुआ। उसी प्रकार एक हेल्पलाइन शुरू की गई थी कि जिसको जो आवश्यकता है वह संपर्क करे, उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति की जाएगी। तो कई लोगों के सन्देश आते थे। उनके लिए भोजन, अन्य सामग्री उपलब्ध कराई गई। अल्प समय में ऐसे कई फोन आते थे, उन तक सामग्री पहुंच जाती थी। इस हेल्पलाइन को जब अन्य प्रांतों में लोग जब देखते थे तो उनको तो यह जानकारी नहीं रहती थी कि ये दिल्ली में व्यवस्था है, परंतु वे फोन कर देते थे। किसी अन्य प्रांत में जो लोग अटके थे, उनकी भी कुछ मांगें आती थीं। परन्तु दिल्ली की हमारी व्यवस्था ने तत्परता से उन-उन प्रांतों को सूचित करके उनकी तुरंत व्यवस्था की। ऐसे कई प्रकार के संवाद किए। अच्छी व्यवस्था होने के कारण इस हेल्पलाइन का बहुत अच्छा उपयोग हुआ है। एक हमने हेल्पलाइन सेवा भारती के नाम से शुरू की थी, किसी प्रकार की भी सेवा की आवश्यकता हेतु। हमारा अनुभव रहा है कि उस सेवा का लाभ बहुत लोगों को हुआ है और उसके कारण हम लोग कुछ बातें पहुंचा सके। एक बहुत पीड़ादायक कालखंड रहा यह। स्वयंसेवकों ने बहुत ही संवेदना के साथ सब प्रकार के कामों को किया है।
इस महामारी का एक खास पक्ष है क्योंकि इसमें सामने कोई शत्रु नहीं है, शत्रु अदृश्य है और इसलिए उसका कोई पूर्वानुमान हम नहीं कर सकते। पूर्वानुमान ना होने के कारण जो-जो घटनाएं घटती जा रही हैं, उनको देखकर ही सब प्रकार की नीतियों में, व्यवस्थाओं में परिवर्तन करना पड़ता था। मैं एक बात और जोड़ना चाहूंगा कि इसमें समाज के भिन्न-भिन्न प्रकार की जो धार्मिक संस्थाएं हैं, उन्होंने हमको बहुत बड़ा सहयोग किया है। गुरुद्वारे हैं, जैन समाज की संस्थाएं हैं, लायंस क्लब, रोटरी क्लब जैसी संस्थाएं हैं, जिन्होंने व्यवस्था में पूरा सहयोग किया है। ये तो मैंने बड़े नाम लिए, परंतु स्थान-स्थान पर छोटी-छोटी संस्थाओं ने भी हमारे साथ मिलकर इस प्रकार के काम में साधन जुटाने में बड़ी भूमिका निभाई है। मनुष्य शक्ति द्वारा जो करना है, उसमें संघ के स्वयंसेवकों ने एक भूमिका का निर्वाह किया है।
संघ ऐसी क्या 'ट्रेनिंग' देता है कि स्वयंसेवक स्वत:स्फूर्त सहायता के लिए खड़ा हो जाता है? उदाहरण के लिए, परिजन भी मृतकों का अंतिम संस्कार करने नहीं पहुंचे, लेकिन स्वयंसेवकों ने प्रशासन के साथ सहयोग करते हुए, सिविल अस्पतालों के साथ सहयोग करते हुए वे सारे काम किये। उन्हें किस तरह का प्रशिक्षण दिया जाता है?
हम आपदा प्रबंधन के विशेषज्ञ नहीं हैं। इस प्रकार का हमने कोई प्रशिक्षण नहीं दिया है। परंतु संघ में एक संस्कार मिलता है। जब भी ऐसी आपदाएं आती हैं तो वे आपदाएं हम पर आई हैं, ऐसा समझ कर हमें अपनी सारी शक्ति लगाने का संस्कार। इस प्रकार का विचार संगठन में हमेशा होता आया है और उसका ही परिणाम है कि स्वयंसेवक परिस्थिति को समझकर उसके अनुसार अपने आपको तैयार करता जाता है। हम कोई प्रशिक्षण नहीं देते। हम साधन भी कभी-कभी नहीं दे पाते, साधन जुटाने का काम भी वह करता है, उसके लिए समाज के पास जाता है। हमारी कोई केंद्रीय व्यवस्था नहीं है कि कोई आदेश निकालेगा, कोई व्यवस्थाएं बनाएगा। लेकिन दृष्टिकोण यह है कि हम संकट के मूक साक्षी नहीं बनेंगे। जब हम कहते हैं कि सारा समाज अपना है तो स्वाभाविक रूप से यह क्रिया बिना किसी सूचना के, बिना किसी आदेश के होती। मैं इतने वर्षों के अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि बिना प्रशिक्षण के हमारे स्वयंसेवक प्रशिक्षित लोगों के समान काम करते हैं।
संघ-विचार से प्रेरित बहुत से संगठन और उद्योग हैं, आर्थिक क्षेत्र में कई संगठन काम करते हैं, उन्होंने भी कुछ पहल की है। इस आर्थिक संकट को संघ कैसे देखता है?
संकट अलग-अलग प्रकार के हैं, यह जो मजदूरों का स्थलांतरण हुआ है, यह एक विशेष परिस्थिति में हुआ है। इन्हें स्थलांतरण करने की आवश्यकता न रहे, इसका दूरगामी समाधान आवश्यक है। आज तुरंत दूरगामी समाधान नहीं सोच सकते। परंतु इसका निश्चित समाधान तो इसी में है कि मजदूरों का कम से कम रोजगार के लिए बहुत बड़ा स्थलांतरण किसी भी देश के लिए उचित नहीं। परन्तु यह सिद्धांत हो गया है। आज व्यावहारिक धरातल पर देखें, तो लोगों को रोजगार चाहिए, उद्योग चलाने वालों को भी मजदूरों की आवश्यकता है। इसलिए यह जो एक स्थलांतरण हुआ है, मैं इसको अस्थाई मानता हूं। बड़ी संभावना है कि बहुत बड़ा प्रतिशत सामान्य परिस्थिति आते ही फिर अपने-अपने स्थान पर जाएगा। परंतु इसके साथ ही, कुछ प्रतिशत वर्ग जरूर ऐसा होगा कि जो अब अपने गांव की तरफ गया है, वह वहीं रहेगा। यह स्वाभाविक है। एक आवश्यकता ध्यान में आती है, जिसे राज्यों में करना होगा। वह यह कि अपने स्थान पर लौट कर आए मजदूरों का फिर एक बार पुनर्वसन कैसे हो। रोजगार यहीं पर उपलब्ध कैसे हो। इसका विचार राज्य सरकारों को प्रारंभ करना चाहिए और किया भी है। मैं समझता हूं कि कुछ राज्यों ने इसमें अच्छी पहल की है। कौशल विकास का जो प्रश्न आता है तो उसकी योजनाएं हैं। वे जितनी अच्छी बनेंगी उसके आधार पर अपने क्षेत्र में ही इस प्रकार के कौशल उपलब्ध करा सकेंगे। ऐसे में बाहर जाने की आवश्यकता नहीं रहेगी। इसलिए यह संकट में भी एक अवसर है कि समस्या के समाधान की दिशा में अच्छे प्रयोग किये जाएं। मुझे लगता है कि यह बहुत आवश्यक बात होगी।
इस संकट ने एक अवसर दिया है। इस अवसर को अच्छे परिणाम की दिशा में परिवर्तित करने में सरकार और स्वयंसेवी संस्थाएं आगे आएंगी। कौशल विकास में अच्छी योजनाएं बनें। इसके लिए थोड़ी अपनी सीमाएं छोड़नी पड़ेंगी। ऐसे संकट के काल में कोई एक मानक प्रारूप, 'फॉरमैट' बनना मुश्किल है। इसलिए उसकी आवश्यकता नहीं। स्थान-स्थान का सर्वे करते हुए यह करने की आवश्यकता रहेगी। कुछ राज्यों ने इस दिशा में अच्छी पहल की है। लेकिन बहुत बड़ी मात्रा में मजदूर वापस जाएंगे। उद्योग चलना है तो तुरंत वहां मजदूर मिलेंगे, ऐसा नहीं है और इसलिए अभी मैं जो अनुभव कर रहा हूं, उससे लगता है, वापस लौटने की प्रक्रिया भी धीरे-धीरे प्रारंभ हुई है। लोग जाना चाहते हैं और उद्योग चलाने वाले भी चाहते हैं कि मजदूर मिलें, तो यह एक अच्छी पहल होगी। एक और बात ध्यान में आई कि जितना इन व्यवस्थाओं को विकेन्द्रित करते जाएंगे, उतना अच्छा होगा। कुछ राज्य हैं, जहां से मजदूर ज्यादा स्थलांतरण करते हैं, कुछ राज्य हैं कि जहां पर ज्यादा स्थलांतरित मजदूर आते हैं। जहां उद्योग ज्यादा हैं, वहीं पर बाहर के मजदूर आते हैं। उद्योगों का केंद्रीकरण होगा तो यह स्वाभाविक है। पर, जैसा मैंने कहा, कुछ दीर्घकालिक बातें हैं। उद्योगों के विकेंद्रीकरण में कुछ समय लगेगा। तत्कालीन स्थिति में तो मजदूर वापस जाएंगे। उद्योग शुरू होंगे। उद्योग शुरू होंगे तो रोजगार शुरू हो जाएंगे।
दूसरा सबसे बड़ा नुकसान हुआ है जो स्वयं रोजगार करते हैं उनका। जिनका रोज का काम है, जैसे जो रिक्शा चलाते हैं, सब्जी का ठेला चलाते हैं, छोटी-मोटी चाय की टपरी चलाते हैं, उनके जीवन में जरूर प्रश्न ज्यादा आए हैं। ऐसे सब लोगों का जीवन कैसे पूर्ववत प्रारंभ होगा? यह लॉकडाउन और उसकी वजह से जो यह समस्या पैदा हुई है, जब तक वह हल नहीं होगी, तब तक यह रोज का जीवन प्रारंभ नहीं होगा। इसलिए इस बारे में शासन की पहल का हम स्वागत करते हैं कि उन्होंने ‘अनलॉक’ पद्धति शुरू की है। अब लॉकडाउन नहीं है, अनलॉक है। ताला लगाया है, अब ताला खोलना है। ताला खोलने की भी एक प्रक्रिया रहेगी। मुझे लगता है कि यह दृष्टिकोण सरकार द्वारा सामने रखने से बहुत अल्प समय में सब कुछ एक बार फिर शुरू होगा। संकट कम होता जाए तो ये बातें सामान्य होती जाएंगी। इसलिए भारत की सामाजिक रचना में स्वयंरोजगार और विकेंद्रीकरण जितना ज्यादा होगा, उतना यह लाभदायक होगा। तुरंत तो पुरानी व्यवस्थाओं को फिर एक बार अल्प समय में शुरू होना चाहिए। मुझे लगता है कि जल्दी ही यह प्रक्रिया शुरू हो जाएगी।
आर्थिक विषय में और एक बिंदु चर्चा में आया, प्रधानमंत्री ने भी उस पर आह्वान किया है। स्वयंसेवी संगठन भी उसके बारे में कुछ न कुछ पहल कर रहे हैं। यह है स्वदेशी और आत्मनिर्भर भारत का विषय। यानी आत्मनिर्भरता किस तरह से? क्योंकि अभी तो वैश्वीकरण का युग माना जाता है, एक दूसरे पर निर्भरता बहुत ज्यादा है। ऐसे में आर्थिक विषयों के जानकार सवाल करते हैं कि किस तरह से भारत आत्मनिर्भर होगा? क्या केवल किसी देश का बहिष्कार करने से यह संभव है?
इसमें अगर थोड़ा सोचें तो पाएंगे कि कई प्रकार के जिलों में कई प्रकार के उत्पादन होते हैं। प्रधानमंत्री जी ने बहुत अच्छा शब्द प्रयोग किया है - 'लोकल' के लिए 'वोकल'। यानी स्थानीय के लिए मुखर बनो। अगर इसको बढ़ावा मिलता है तो बहुत अच्छा होगा। छोटे-छोटे काम हैं, उदाहरण के लिये, कहीं बेकरी उत्पादनों की जितनी आवश्यकता है, वह वहीं पर पूरी होगी। बाहर से आने की आवश्यकता नहीं। ऐसा एक बहुत बड़ा अध्ययन करते हुए उन जिलों की सामान्य चीजों की आवश्यकताएं वहीं पर पूरी करने की व्यवस्था करनी है। मैं मानता हूं कि कुछ वस्तुएं, जो छोटे उद्योगों से मिलने वाली नहीं है, जो बड़े उद्योगों में ही बनेंगी. ऐसे छोटे उद्योगों को प्रोत्साहित करने का काम हर जिले, उसको अगर केंद्र मानें, थोड़ा और बड़ा उद्योग है तो उसका राज्य केंद्र मानें, राज्य को केंद्र में रखकर विचार करें, तो उसके आगे जाकर वैश्विक स्तर पर विचार करना है। यह ठीक है कि आज परस्परावलंबन का जीवन प्रारंभ हुआ है। परंतु यह अवसर है कि हम अपने देश की आवश्यकताएं अपने देश में पूरी करें। उसके नीचे, अपने राज्य की आवश्यकता हम राज्य में पूरी करें। उसके नीचे, अपने जिले की आवश्यकता अपने जिले में पूरी करें। जिला इकाई को इस समय आत्मनिर्भर भारत की दिशा में अगर जाना है तो हमको जिला केंद्र, उस जिले को एक इकाई मानकर उसको और अधिक विकसित करने की आवश्यकता रहेगी। अब यह जरूर है कि कुछ बड़े उद्योगों के लिए राज्य भी केंद्र नहीं बन सकता है, उसके लिए देश भर का विचार होता है। इसलिए प्रान्त पर बहुत बड़ा उद्योग जगत विकेंद्रित हो सकता है। उस प्रांत की, उस जिले की आवश्यकताएं वहीं पर पूरी हों, इस दिशा में हमको पहल करनी पड़ेगी।
दूसरे, इस घटना के कारण एक स्वदेशी का भाव विकसित हुआ है। एक विचार धीरे-धीरे प्रसूत भी हो रहा है कि यथासंभव देश आत्मनिर्भर बनेगा तो हमारी आवश्यकता यहां पूरी होगी। हमारी आवश्यकताएं थोड़ी कम-ज्यादा गुणवत्ता की होंगी, तो भी हम उसको स्वीकार करेंगे। इस प्रकार का मानस बन रहा है। इसको और अधिक प्रोत्साहित करने की आवश्यकता रहेगी। बहुत बार गुणवत्ता पर आकर गाड़ी रुक जाती है। पर अगर करोड़ों के समाज ने यह स्वीकार कर लिया कि गुणवत्ता में थोड़ी कमी भले रहे, परंतु अपना ही लेना है, तो फिर आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बहुत अच्छी बातें आ सकती हैं। इसलिए अपने आप में यह बड़ी बात होगी कि अपने देश के महापुरुषों का सपना सच होगा। जो यही रहा है कि देश अपने पैरों पर खड़ा रहे, दूसरों के गुणगान करने से हम कभी बड़े नहीं हुए। दूसरों की नकल करने से भी हम बड़े नहीं हुए। अपने यहां पर प्रतिभाएं हैं, पुरुषार्थ है। जो भी सहयोग चाहिए उसकी अगर व्यवस्था अच्छी बन जाती है तो मैं समझता हूं कि आत्मनिर्भर भारत केवल नारा नहीं रहेगा, इसे हम प्रत्यक्ष साकार होते देख सकेंगे। उसके लिए और अधिक नियोजन चाहिए, वह हो जाए, बस यही अपेक्षा करता हूं।
आपने एक सकारात्मक पहलू रखा। लेकिन सामान्यत: समाज में जब चर्चा चलती है, विशेषकर सोशल मीडिया में, तो इसका नकारात्मक पहलू सामने आता है। वर्तमान में सीमा पर जिस तरह का माहौल है, उसको लेकर 'बॉयकॉट चाइनीज प्रोडक्ट्स' की लाइन पर ही सारी चर्चा होती है। आप इसको कैसे देखते हैं?
यह तो स्वाभाविक है। जब इतनी बड़ी चर्चा किसी एक देश को लेकर सारी दुनिया में चल रही है तो भारत में भी चलेगी। आज उसका प्रतिनिधि देश, चीन बन गया है। इसलिए स्वाभाविक रूप से, सामान्य व्यक्ति कह रहा है कि हम यह नहीं लेंगे, हम इसको सहयोग नहीं करेंगे। मुझे लगता है कि यह मन की स्वाभाविक भावनाएं प्रकट हो रही हैं किसी अघोषित शत्रु के खिलाफ। मैं समझता हूं कि यह केवल किसी एक देश तक सीमित नहीं रहेगा। आगे चलकर अपने आप आत्मनिर्भर बनने की दिशा में जाएगा। शुरू में नकारात्मक लग सकता है कि किसी देश की वस्तुओं का बहिष्कार करो, परंतु समाज जीवन की आवश्यकता है, वह जब पूरी नहीं होगी तो बहिष्कार करने से कैसे चलेगा? इसलिए इसकी पूरी व्यवस्था चाहिए। आज शुरुआत इससे हुई कि हम चीन की चीजें नहीं लेंगे। यह स्वाभाविक हुआ है, किसी ने जनांदोलन नहीं बनाया। आज सामान्य व्यक्ति भी कहता है - चीन का है तो हमको नहीं चाहिए। अब इसके बारे में तो चीन को सोचना पड़ेगा कि क्या करना है। लेकिन हमारे लिए यह अवसर जरूर है। यह केवल भारत के लिए नहीं, दुनिया के लिए भी अच्छा संदेश है कि हर देश अपनी-अपनी आवश्यकताएं अपने बल पर पूरी करे। वह न दूसरों का शोषण करे, न दूसरों पर निर्भर रहे।
इसी से जुड़ा एक और मुद्दा चर्चा में है। सीमा पर संकट से हमारी सेना और सरकार निपटी है। यह विषय बार-बार उठता रहा है। इस बार आप उसमें क्या परिवर्तन देखते हैं? राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा सुरक्षा, सीमा पर आधारभूत ढांचा  निर्माण आदि पर क्या कहेंगे?
वास्तव में यह विषय हमारी सोच की परिधि से बाहर का है, क्योंकि इसमें सुरक्षा बल व सरकार की नीतियां बनती हैं, यह विषय उस पर चलने वाला है। पर, कोई भी देश अपने देश की सीमाओं पर आक्रमण कैसे स्वीकार कर सकता है? कोई भी देश अपने सीमावर्ती देशों के साथ तनाव नहीं चाहता है। परंतु इसका विचार दोनों तरफ से होने की आवश्यकता रहती है। इसलिए आज की परिस्थिति में मुझे लगता है, इसका समाधान देश की सेनाएं, हमारे रक्षा मंत्री, प्रधानमंत्री इन सबको मिलकर विचार करना है कि इस संकट से भारत की सुरक्षा कैसे होगी। यह सामान्यजन का नहीं, सरकार और सेना का विषय है। हम सामान्यजन सेना पर पूरा विश्वास करते हैं। अपनी सेना का सामर्थ्य अच्छा है, इसको ध्यान में रखते हुए सरकार अपनी नीतियां और जो योजनाएं बनानी हैं, वे बनाए। मैं इतना विश्वास के साथ कह सकता हूं कि इस समय शासन जो पहल करेगा, सारा समाज सरकार के पीछे खड़ा रहेगा।
आज डिजिटल शिक्षा की बात चल रही है। लेकिन समाज के हर वर्ग के पास ऐसी शिक्षा पहुंचना इतना आसान भी नहीं है। ऐसे में आने वाले समय में शिक्षा में परिवर्तन होंगे। समाज केंद्रित शिक्षा की संघ बात करता ही रहा है, तो शिक्षा क्षेत्र को लेकर चुनौती पर संघ के अन्य संगठन क्या कुछ पहल कर रहे हैं?
वर्तमान में संकट भिन्न प्रकार का है। उसमें दो पहलू हैं - भारत में शासकीय के साथ ही, निजी शिक्षा संस्थान भी बहुत बड़ी मात्रा में हैं जो समाज के सहयोग पर चलते हैं। अब इस आर्थिक संकट में वह कैसे इनका निर्वाह करेंगे, यह उनके सामने प्रश्न है, क्योंकि वह स्वयं अपने ही बल पर खड़े हैं। इसका बहुत बड़ा हिस्सा है, वह समाज उठाता है - शिक्षा शुल्क के माध्यम से उस पर थोड़ा असर इस कालखंड में होने वाला है। जिन संस्थानों पर आर्थिक संकट है, उनमें इस प्रकार की कैसी शिक्षा उपलब्ध होगी? इसका अलग-अलग लोगों से मिलकर विचार करने की आवश्यकता है। यह संकट कम से कम एक साल रहने वाला है। भिन्न-भिन्न प्रकार के आधुनिक माध्यमों का सहयोग लेते हुए शिक्षा दी जाए, इसकी भी अपनी एक सीमा है। अगर हम मानें कि 8 प्रतिशत जनजाति क्षेत्र है, जहां पर दूरदराज में ऐसी व्यवस्था पर नहीं पहुंची है। उनका क्या होगा। एक बहुत बड़ा वर्ग गरीबी रेखा के नीचे है, उनके पास इतने भी साधन नहीं होंगे। उनके बच्चों की शिक्षा का क्या होगा? यानी आधुनिक साधनों का उपयोग करते हुए शिक्षा पहुंचाने की जो बात हो रही है इसकी भी अपनी एक सीमा है। इसमें से कुछ रास्ता निकालना पड़ेगा। स्वयंसेवी संस्थाएं इसका कुछ जिम्मा उठा सकती हैं। वे बच्चों की कोचिंग करें, बच्चों को सिखाएं। अपने घर में कोचिंग क्लास जैसी चलाएं। इस एक वर्ष को हम अपनी योजनाओं के आधार पर पार कर लें। फिर अगले वर्ष में कुछ चीजें सुलभ हो सकती हैं। हम तो यह चाह रहे हैं कि समाज की सब प्रकार की ऐसी व्यवस्थाओं को मिलकर इस एक वर्ष का विचार तुरंत करना चाहिए। 'अफोर्डेबल एजुकेशन' और 'क्वालिटी एजुकेशन' हमारा हमेशा का सिद्धांत रहा है। उसकी व्यवस्था का पक्ष इस कालखंड में किस प्रकार का होगा, उसका व्यावहारिक विचार करना पड़ेगा। उसके लिए तुरंत जो आवश्यकता है कि शैक्षिक वर्ष में किसी भी छात्र का नुकसान ना हो, इसको सामने रखकर विचार करना चाहिए, नहीं तो एक साल शिक्षा भी रुक जाएगी। भारत के पूरे समाज जीवन में एक साल का अंतर आ जाएगा। यह किसी देश के लिए भी वहनीय नहीं है। मुझे विश्वास है कि समाज की सब प्रकार की शक्ति का ठीक नियोजन हो जाएगा। ठीक योजना से चलते हुए इस  कालखंड में हुई हानि से देश-समाज को बाहर ला सकेंगे।
भारत की परंपरा में मेले हैं, यात्राएं हैं। इनमें लोग इकट्ठे आते हैं। कोरोना के संकट में इन पर प्रतिबंध हैं। अदालत की आज्ञा से जगन्नाथ रथयात्रा पूरी हुई। यही परंपराएं समाज को जोड़कर भी रखती हैं। फिर भी जब तक हल न निकल आए तब तक मन में प्रश्न खड़े होते रहेंगे। समाज किस तरह से इन चीजों को देखे?
यहां पर मैं पुन: अपने समाज को साधुवाद देना चाहूंगा। यह सब हमारी हजारों वर्षों की परंपराओं से जुड़ा है, भावात्मक है, लेकिन इस संकट में हमको इन बातों के साथ थोड़ा समझौता करना चाहिए। इसे समाज ने स्वीकार कर लिया है। यह शासन के नियंत्रण के बाहर की बात थी। परन्तु समाज के सोचने का स्तर यह दर्शाता है कि हम कितना लचीलापन ला सकते हैं। इसलिए जगन्नाथ की रथयात्रा में लोगों ने सुलह कर ली कि ठीक है, इस साल यह उस रूप में नहीं होगी। अभी सूर्य ग्रहण हुआ, कुरुक्षेत्र में प्रतिवर्ष ग्रहण के समय लाखों लोग जाते हैं। इस बार कोई नहीं गया। लोगों ने अपने मन के स्तर पर ईश्वर को नजरों के सामने करते हुए अपने अपने घर में पूजा-पाठ किया।
यह भारत की एक बहुत विशेष बात है कि परंपराओं के साथ भी हम आवश्यकता पड़ने पर थोड़े लचीले रहकर इस स्थिति को स्वीकार कर लेंगे। पंढरपुर का प्रश्न हल हुआ, जगन्नाथ की रथयात्रा का प्रश्न हल हुआ। मंदिर बंद थे, लोगों ने अपने घर में ही पूजा करनी प्रारंभ की। किसी ने मजाक में कहा - पहले कुछ मंदिर थे, पर अब तो घर-घर में मंदिर बन गए। यह बड़ी बात है कि घर-घर में लोगों ने पूजा पाठ शुरू कर दिया। ठीक है, हमारे मंदिर प्रतीकात्मक हैं, हमें उनमें जाना चाहिए। पर इस कालखंड में वहां नहीं जा सकते, तो नहीं जाएंगे। ये जो लचीलापन है न, दुनिया के सामने एक बार फिर इसका, भारत का एक विशेष परिचय हुआ है। यह जरूर है कि मंदिर शक्ति के केंद्र हैं, प्रेरणा के केंद्र हैं, श्रद्धा के केंद्र हैं। हमारे मेले जीवन को दिशा देने वाले हैं। वे शीघ्रता से पुन: पूर्ववत होने चाहिए, यह हम सबकी इच्छा है। परंतु अगर समाज जीवन के स्वास्थ्य को सामने रखकर ही नियमों का पालन करना है, तो पालन करने वाला समाज भी हमने देखा, यह अद्भुत है।
ऐसी स्थिति में भी कुछ तत्व ऐसे दिखाई देते हैं जो समाज में भेद पैदा करते हें। अमेरिका में वर्णभेद के कारण कुछ समस्या हुई, उसके आधार पर, भारत में भी ऐसा क्यों नहीं हो रहा है, इस पर चर्चा छेड़ने का प्रयास हुआ। प्रवासी श्रमिकों के मामले में भी देखा कि लोगों को भड़काने के प्रयास हुए। जाति, संप्रदाय के आधार पर भेद पैदा करने के प्रयास हुए। आने वाले समय में इसे एक संकट माना जा रहा है। ऐसे तत्व बहुत सारे हैं। समाज को इन्हें कैसे देखना चाहिए? संघ इन तत्वों को रोकने के लिए कुछ कर रहा है क्या?
इतने वर्षों का अपना अनुभव है कि कुछ असामाजिक, अराष्ट्रीय शक्तियां ऐसे अवसरों का लाभ उठाकर समाज व्यवस्था और देश को दुर्बल करने का षड्यंत्र करती आई हैं। इस कालखंड में भी यह होना कोई असंभव नहीं है, परंतु अब संघ भी इतना बड़ा हुआ है। संघ की शक्ति भी कुछ बढ़ी है। उसके आधार पर ऐसी ताकतों के संदर्भ में हम समाज जागरण का प्रयास कर सकते हैं और करेंगे। मुझे विश्वास है कि अपने यहां सामाजिक जाति-बिरादरी की जो व्यवस्था है, साधु-संतों की व्यवस्थाएं हैं, इतने वर्षों का संघ का भी तप है। इस सबका पूरा उपयोग करते हुए, इन षड्यंत्रों को हम जितना निष्प्रभावी कर सकते हैं वह करने की कोशिश होगी। मैं समझता हूं कि इतनी आसानी से ऐसे तत्व सफल नहीं होंगे. भारत के अंदर, क्योंकि भारत का मानस उत्तेजित होता है। भारत का दुर्बल वर्ग पीड़ित होता है। उसको समझना पड़ेगा, पीड़ा दूर करने का प्रयास करना पड़ेगा। इस संकट का लाभ उठाते हुए अगर देश को कोई दुर्बल करना चाहेगा, तो मैं समझता हूं कि संघ जैसे संगठन अपनी समाज जागरण की भूमिका प्रभावी रूप से करेंगे। इस संकट से समाज को सुरक्षित किया जा सकता है। इन सबमें सबके साझे प्रयास की आवश्यकता है। संघ इसमें कुछ जरूर अपने स्वयंसेवकों की शक्ति के बल पर कुछ पहल करेगा।
संघ का यह मत रहा है कि भारत की समस्या भारत के तरीके से सुलझनी चाहिए। कुछ भेद हो सकते हैं, समाज में कुछ तनाव आ सकते हैं, लेकिन उन्हें दूर करने का भारत का अपना तरीका है। क्या यह आज के संदर्भ में और भी महत्वपूर्ण नहीं है?
बिल्कुल, निश्चित है। हर देश की समाज रचना और समाज का मानस भिन्न प्रकार का है। इसलिए हमारे यहां की समस्याओं का उत्तर हम अन्य देशों की तरफ देखकर नहीं ढूंढ सकते। हम प्रश्नों को समझते हैं, उनकी जड़ को समझते हैं। हम उनके समाधान को भी समझते हैं। इसलिए भारत की जो समस्याएं हैं, दूसरों के चश्मे से और दूसरों के साधनों से हल नहीं हो सकतीं। यहां की मूल बात को समझकर उसका समाधान ढूंढना पड़ता है और संघ ने इस दिशा में प्रयास भी किया है। यहां के प्रश्न हैं तो समाधान भी यहीं के मार्ग से निकलेगा। अपने यहां के समाज-मन को एक सीमा विशेष से आगे विकृत करने की किसी की भी कोई भी कोशिश सफल नहीं होगी। हां, यह बात जरूर है कि ऐसा सोचने वाली सकारात्मक शक्तियों को और प्रभावी पहल करनी पड़ेगी। यह तय है कि हम इसे करने की कोशिश करेंगे।