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बचत आधारित अर्थव्यवस्था होने से भारत अन्य देशों के मुकाबले मजबूत
April 3, 2020 • तहलका ब्यूरो • लेख

शंकर अग्रवाल

आज कोरोना वायरस जैसी गम्भीर बीमारी से भारत ही नहीं पूरा विश्व परेशान है। महामारी एवं बीमारी के अलावा विश्व की अर्थव्यवस्था को लेकर अभी से सभी अर्थशास्त्री सरकारें चिन्तित है। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया भी है कि इतने लम्बे समय तक लाॅकडाऊन रहनें से अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पडे़गा वहीं उद्योग, कल कारखाने बन्द होनें से सकल घरेलू उत्पाद अर्थात जी.डी.पी. पर भी बुरा असर होगा।

हमारी अर्थव्यवस्था 1991 के बाद ग्लोबल अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन चुकी है। अतः विश्व में कहीं भी कुछ होता है, उसके परिणामों से भारत की अर्थव्यवस्था अछूती नहीं रह सकती।

आज हमारी जी.डी.पी. का अनुमान 4.50 से 5 प्रतिशत का है जो अब कहां तक नीचे जाएगा अनुमान लगाना कठिन है। इसी तरह से विश्व की जी.डी.पी. भी 2.50 प्रतिशत से काफी नीचे जाऐगी ऐसा अनुमान है। लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था ने इन पहलुओं के अलावा भी अनेक पहलू हैं जो अर्थव्यवस्था को प्रभावित करतें है।

सरकार ने आम आदमी को राहत देने हेतु अनेक उपायों की घोषणा की है। सरकार की इन घोषणाओं का प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष सभी को कुछ लाभ मिलेगा। गरीब बी.पी.एल. परिवारों को प्रत्यक्ष तो मध्यम उच्च वर्ग को .एम.आई. ब्याज दर आदि में छूट का लाभ मिलेगा ही। इन समस्त उपायों से सरकार के ख़जाने पर प्रत्यक्ष भार पड़ेगा।

इन सब कल्याणकारी उपायों के बीच एक शंका सभी के मन में बनी है कि हमारी अर्थव्यवस्था पूर्णतः चौपट तो नही हो जाऐगी? क्योकि पहले से मंदी की मार झेल रही अर्थव्यवस्था पर कोरोना जैसी महामारी का प्रभाव निश्चित ही नकारात्मक होगा। विश्व के अनेक छोटे देश कई वर्षों तक उठ नही पाऐंगे, लेकिन भारत के संदर्भ में ऐसा नहीं है। यद्यपि नकारात्मक सोच रखनें वालों ने अर्थव्यवस्था को लेकर अभी से घंटियां बजाना प्रारम्भ कर दिया है, लेकिन उनकों यह नहीं भूलना चाहिए कि नरसिंम्हाराव सरकार ने किन दबावों के आगे विदेशी कम्पनीयों को भारत में व्यापार की छूट दी थी चन्द्रशेखर सरकार ने सोना रखकर अर्थव्यवस्था को खड़ा किया था। आज हालात उससे कई गुना बेहतर है एवं वो दिन कभी नहीं आने वाले।

भारत में हर व्यक्ति चाहे वह कितना ही कम मासिक कमाता हो कुछ कुछ अपने भविष्य के लिए बचत करके रखता है। इसमें भी प्रत्यक्ष बचत के अलावा सोना, चांदी आदि भी संचय कर रखता है जो उसके बुरे समय में काम आए, यह हमारे देश की मिट्टी में है। यह व्यवस्था हर वर्ग अपनाता है। अतः यूं कहें कि भारत की अर्थव्यवस्था में व्यक्तिगत बचत एक बड़ा आधार है।

विदेशों में जहां व्यक्ति केवल अपनी आय में से कार, घर, टी.वी. आदि की मासिक किश्त सरकारी कर जोड़ने के बाद शेष बची राशि केवल अपने रहन-सहन एवं ऐशो-आराम पर खर्च करने की योजना बनाता है जब किश्त देने की स्थिति नहीं रहती है तो कार, टी.वी. समुद्र किनारे छोड़ कर भाग जाते है ऐसा अनेको बार अनेक देशों में घटित हुआ है।

भारत में इस व्यवस्था के विपरीत व्यवस्था है। एक अध्ययन के मुताबिक भारत में घरेलू बचत 30.1 प्रतिशत है जो चीन की 36.1 प्रतिशत के बाद विश्व में सबसे ज्यादा है। इटली में यह दर 8.90 प्रतिशत, अमेरिका मेे 7.9 प्रतिशत, जर्मनी में 11.2 प्रतिशत, ब्रिटेन में 5.5, जापान में 18.9 प्रतिशत है। इन सबकी तुलना करें तो भारत अपनी घरेलू बचत में अन्य देशों से कहीं आगे खड़ा है।

कोरोना के कारण प्रभावित जन सामान्य के लिए सरकारी राहत के अलावा अनेक भामाशाहों ने प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री सहायता कोष में सहयोग किया है। साथ ही अनेक सामाजिक संस्थाएं अपने स्तर पर कार्य में लगी है एवं गरीब प्रभावित लोगों अपने-अपने स्तर पर सहयोग कर रही है। वैसे भी सामान्य दिनों में भी भारत में लाखों लोगों को समर्थ लोग दान के माध्ययम से खाना खिलाते है। अनेक ट्रस्ट, धर्मशालाएं, अनाथ आश्रम संस्थाएं भी निरन्तर इन कामों में लगी रहती है। यह भारत के अलावा किसी अन्य देशों में हो यह संभव नहीं है। वसुधैव कुटुम्ब की भावना एवं उसकी अवधारणा भारत में ही दिखाई देती है। अन्य देशों में तो अपने स्वयं के अलावा अपने माँ-बाप एवं अपने बच्चों तक की चिन्ता तक नहीं करते। यही कारण है कि भारत आज अपने पैरों पर खड़ा है कोरोना जैसी विभिषिका के अनेक झटके झेल कर भी हमारी अर्थव्यवस्था सुदृढ़ रहेगी। कोरोना महामारी भी इसी तरह का प्राकृतिक संकट है जो हमारा देश झेल लेगा इस दौर से गुजर जाऐगा।

इस अवसर पर इतिहास में झांक कर देखें तो दो घटनाओं का उल्लेख करना उचित होगा, 1965 के युद्ध के बाद देश में अनाज की कमी होने पर हमारे देश के तात्काकिक प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने अमेरिका की शर्तों के आगे झुक कर अनाज लेना अस्वीकार कर दिया था देश के लोगों को सप्ताह में एक दिन के उपवास का आह्नान किया। कहते है शास्त्री जी के आह्नान का इतना असर हुआ कि उस दिन रेस्टोरेंट एवं भोजनालय भी बंद रहते थे। दूसरा श्री अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय परमाणु विस्फोट के विरोध में विश्व के अधिकांश देशों ने भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए थे। उस समय भारत के जितने भी अप्रवासी भारतीय विदेशों में रहते थे उन्होंने वाजपेयी जी को पत्र लिखकर कहा था कि हम इन प्रतिबंधों के कारण होने वाले नुकसान की भरपाई करने को तैयार है लेकिन आप देश के स्वाभिमान की कीमत पर किसी के सामने झुके नहीं, परिणाम स्वरूप विश्व के किसी भी देश के सामने भारत नहीं झुका समस्त विश्व को स्वतः ही प्रतिबंध हटाने पर मजबूर होना पड़ा। इस समय इकबाल का वह वाक्य याद आता है

’’यूनान, मिस्र, रोम सब मिट गए जहां से, अब तक मगर है बाकी नामों निशां हमारा, कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी। सदियों रहा है, दुश्मन दोरे जहां हमारा।’’

अतः संकटों के इस दौर में भी भारत अटल खड़ा रहेगा भारत इस दौर से और मजबूत होकर निकलेगा।

 

लेखक वरिष्ठ सनदी लेखाकार हैं।