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कोरोना से निपटने में महिला स्वयं सहायता समूहों ने निभाई अहम भूमिका
May 4, 2020 • तहलका ब्यूरो • राजस्थान

एक करोड़ 90 लाख मास्क, एक लाख लीटर सेनेटाइजर और 50 हजार लीटर हैंडवॉश का निर्माण किया 

जयपुर। वैश्विक महामारी कोरोना वायरस को मात देने के लिए जहाँ 130 करोड़ भारतवासी चालीस दिन से लॉकडाउन का पालन कर रहे हैं वहीं इस दौरान महिला स्वयं सहायता समूहों की सामूहिक शक्ति भी उजागर हुई है। देश के क़रीब 90 प्रतिशत ज़िलों में कार्यरत महिला स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाएँ फ़ेस मास्क बनाने, सामुदायिक रसोई संचालित करने, आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई और लोगों को स्वास्थ्य और स्वच्छता के प्रति जागरूक करने में जुटी हुई हैं। साथ ही इस बीमारी को लेकर फैलाई जा रही ग़लत सूचनाओं और भ्रामक जानकारी का मुक़ाबला करने में भी सहयोग कर रही हैं।

इन समूहों ने कोरोना वायरस जैसी महामारी से निपटने में भी सरकार का पूरा सहयोग किया है। देश भर में फैले स्वयं सहायता समूह न सिर्फ फ़ेस मास्क की कमी को पूरा करने में सहायक सिद्ध हुए हैं,  बल्कि स्वास्थ्य कर्मियों के लिए पी पी ई किट बनाने में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। जो महिलाएँ स्कूल की यूनिफॉर्म तैयार करती थी अब उन्होंने फ़ेस मास्क बनाना शुरू किया है।  

पिछले कुछ सप्ताह में 27 राज्यों में फैले 20 हजार स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी इन महिलाओं ने एक करोड़ 90 लाख मास्क बनाए हैं। इसके अलावा एक लाख लीटर सेनेटाइजर और 50 हज़ार लीटर हैंडवॉश का निर्माण किया है। क्योंकि इन तीनों चीजों का उत्पादन विकेंद्रीकृत तरीक़े से हुआ है इसलिए इन्हें देश भर में बसी छितराई हुई जनसंख्या तक पहुंचाने के लिए परिवहन के साधनों और अन्य सुविधाओं की आवश्यकता भी कम से कम रही। स्वयं सहायता समूहों ने लॉकडाउन के कारण अपना काम गंवा चुके श्रमिकों और देश के अलग-अलग स्थानों पर फसें मजदूरों के लिए सामुदायिक रसोई का संचालन भी किया। देश के विभिन्न हिस्सों में फँसे मज़दूरों के लिए इन समूहों ने क़रीब 10 हज़ार सामुदायिक किचन की शुरुआत की।

क़रीब 15 वर्ष पहले शुरू हुआ महिला सशक्तिकरण का यह अभियान इस कठिन दौर में देश के लिए अमूल्य संसाधन साबित हुआ है। भारत में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन में विश्व बैंक की सहायता का नेतृत्व करने वाली श्रीमती गायत्री आचार्य का कहना है कि भारत सरकार द्वारा गाँव की महिलाओं को सामाजिक-आर्थिक रूप से मज़बूत करने के उद्देश्य से शुरू की गई इस मुहिम के बहुत अच्छे परिणाम इस कठिन दौर में देखने को मिले हैं। देश में इस समय क़रीब सात लाख स्वयं सहायता समूह हैं जिससे छह करोड़ 70 लाख महिलाएँ जुड़ी हुई हैं। इन समूहों से जुड़ने से पहले ज़्यादातर महिलाएँ बेसहारा और गरीब थीं। स्वयं सहायता समूह की सफलता ने उन्हें न सिर्फ़ आर्थिक रूप से सक्षम बनाया है बल्कि उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा भी बढ़ी है।