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कोरोना वायरस: भारत ने मौका गंवाया ?
June 1, 2020 • राजेंद्र राज • लेख
राजेंद्र राज।
 
भारत ने मौका गंवाया?
देश दुनिया में कोरोना वायरस से कोहराम मचा हुआ है। इस साल चीन के बुहान शहर में इस बीमारी से लोगों के पीड़ित होने के बाद 30 जनवरी को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोरोना वायरस को महामारी घोषित किया। तब से लेकर अब तक पूरी दुनिया में इस वायरस से उथल-पुथल मची हुई है। क्या वास्तव में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जिस माहमारी को लेकर अपनी चिंता व्यक्त की थी, आज 5 महीने बाद भी वे चिंताएं वाजिब है या वे गलत साबित हुई है। हमें उन पर गंभीरता से विचार करना चाहिए और यह सोचना चाहिए कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जो चेतावनी दी थी कि दुनिया में इस महामारी से लाखों लोग केवल भारत में ही दो लाख से अधिक व्यक्ति काल ग्रसित हो जाएंगे, क्या ऐसा हुआ है ? क्या  कोरोनावायरस एक सामान्य सर्दी जुकाम, निमोनिया की तरह ही अपना असर दिखा पाया है। क्योंकि हमारे देश में हर साल निमोनिया जैसी बीमारी से भी डेढ़ लाख लोगों की मृत्यु होती है।  इन 5 महीनों में दुनिया में इस महामारी से हताहत होने के जो आंकड़े मिल रहे हैं, उनसे तो लगता है कि यह निमोनिया जैसी ही बीमारी है । जिसे बहुत बढ़ा- चढ़ाकर विश्व स्वास्थ संगठन ने देश और दुनिया के सामने रखा। इसके परिणाम स्वरूप पूरी दुनिया इससे त्राहिमाम - त्राहिमाम हैं।
 
इस महामारी को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन की भूमिका संदेह के घेरे में है। 
 
संगठन ने बीमारी के शुरू  में कहा कि यह वायरस मानव से मानव में नहीं फैलता और इसलिए उन्होंने विमानों के आवागमन पर कोई रोक नहीं लगाई। बाद में कहा कि यह मानव से मानव में फैलता है। कोरोना से पीड़ित व्यक्ति के संपर्क में आई कोई भी वस्तु से यदि कोई स्वस्थ व्यक्ति संपर्क में आता है तो उसे भी कोरोना संक्रमित कर देता है। डब्ल्यूएचओ की चेतावनी बहुत देर से आई। तब तक चीनी लोग पूरी दुनिया में कोरोना वायरस को अपने साथ साथ फैला चुके थे। इस अदृश्य कोरोना वायरस से जिसे दानव की तरह से देखा जाने लगा। पूरी दुनिया इसके भय से कांपने लगी।
 
दुनिया के 168 देशों की 737 करोड़ आबादी को इस दानव से बचाने के लिए सरकारों ने लोकडाउन के नाम पर घरों में कैद कर दिया। व्यक्ति जो एक सामाजिक प्राणी है उसे समाज से ही नहीं, अपने परिवार से भी दूर कर दिया गया। यदि उसमें कोरोनावायरस के लक्षण है और अनेक बार तो लक्षण नहीं दिखाई देने पर भी संदेह के आधार पर भी उसे परिजनों से दूर कर दिया गया। कोरोनावायरस के लक्षण कभी पीड़ित व्यक्तियों में परिलक्षित होते हैं और कभी नहीं। केवल सामान्य बुखार होने पर भी उसके साथ एक ऐसे राक्षस की तरह व्यवहार किया जाने लगा जैसे उसकी परछाई से ही अन्य लोग संक्रमित हो जाएंगे। 
 
दुनिया के 21 देशों ने डब्ल्यूएचओ के इन सलाह निर्देशों की पालना नहीं की। उनका मानना था कि जो सलाह दी जा रही है , वह इस महामारी से लड़ने के लिए उपयुक्त नहीं है। संगठन ने सलाह दी थी कि लोग एक दूसरे से कम से कम 2 गज की दूरी पर रहे। इसके संक्रमण को रोकने के लिए अच्छा होगा, लोगों का आवागमन रोक दिया जाए। लोग अपने मुंह पर मास्क लगाकर रहे ताकि इसका वायरस एक व्यक्ति से दूसरे को संक्रमित नहीं कर सके। हालांकि अब इस महामारी की लड़ाई में  विश्व स्वास्थ्य संगठन की संदेहास्पद भूमिका की जांच के लिए एक कमेटी का गठन कर दिया गया है। उम्मीद है कि जल्दी ही कमेटी अपनी रिपोर्ट देगी। तभी दुनिया को सही तथ्यों की जानकारी मिल सकेगी।
 
लेकिन, इन 5 महीनों में इस महामारी के प्रकोप का जो प्रभाव देखने को मिला है, उसके आंकड़े विस्मित करने वाले हैं। विश्व स्वास्थ संगठन के दिशानिर्देशों को दुनिया के 21 देशों ने नहीं माना। वहां पर 77000 की आबादी पर एक व्यक्ति की कोरोना वायरस से मृत्यु हुई है। दूसरी ओर जिन देशों ने पूरी तरह से तालाबंदी कर अन्य निर्देशों की पालना की, वहां पर 30 हजार की आबादी पर एक व्यक्ति की मौत हुई। आंकड़े सोचने पर मजबूर करते हैं कि तालाबंदी जैसा घातक उपाय अपनाया जाना इन देशों के लिए कितना नुकसानदायक सिद्ध हुआ है। इसकी एक वजह वह टेस्ट किट भी है जो सही मायने में मानवीय जांच के लिए है ही नहीं। यह टेस्ट किट प्रयोगशाला में जांच के लिए बनाई गई है।
 
दूसरी मुख्य वजह वे दवाइयां भी है जो कोरोना संक्रमित व्यक्तियों को दी गई। यह दवाइयां प्रयोगात्मक रूप से पीड़ित व्यक्तियों को दी गई जिसके संभावित नुकसान क्या होंगे , यह सर्व विदित है। लेकिन, लाभ होगा या नहीं यह केवल आशा और उम्मीद पर ही था। चिकित्सकों ने अपने विवेक से पीड़ित व्यक्तियों को मलेरिया, स्वाइन फ्लू, एच आई एन आई जैसे रोगों पर आजमाई गई दवाओं का प्रयोग किया। शंका है कि धूल में लट्ठ मारने की तरह इन दवाओं से संभावित लाभ की तुलना में नुकसान ही अधिक हुआ होगा। क्योंकि आंकड़े बताते हैं कि दुनिया में जब भी चिकित्सकों की हड़ताल हुई है रोगियों के मरने की संख्या में तुलनात्मक कमी आई है।
 
इस महामारी से बचाव के लिए हमारे देश में केंद्र सरकार ने जो  दिशानिर्देश जारी किए, आइए उन पर भी चर्चा कर लेते हैं। सरकार के निर्देशों के तहत कोराना संक्रमित लोगों के इलाज के लिए जो व्यवस्था की गई उस पर केवल आधुनिक चिकित्सा पद्धति को ही प्राथमिकता दी गई। हमारी देसी चिकित्सा पद्धति यानी आयुर्वेद को इससे दूर रखा गया। यह बहुत ही चिंता का विषय है। एक ओर सरकार आत्मनिर्भर होने का बिगुल बजा रही है और दूसरी ओर उसने 5000 साल से पुरानी आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति को इस योग्य ही नहीं समझा। सरकार यदि चाहती तो योग की तरह दुनिया में आयुर्वेद को भी इस मौके पर एक प्रतिष्ठित चिकित्सा पद्धति के रूप में स्थापित कर सकती थी।
 
यह मौका था जिसे भारत सरकार ने अपने हाथ से जाने दिया। मौजूदा चिकित्सा पद्धति जाने कब वैक्सीन या दवा बनाएगी । क्योंकि उसकी एक लंबी जांच प्रक्रिया है। लेकिन, आयुर्वेद की औषधियां तो हजारों सालों से जांची परखी हुई है। यदि इस मौके पर उन्हें आजमाया जाता और उनसे इस महामारी का मुकाबला किया जाता। तो निश्चित ही हम दवाओं के मामले में आत्मनिर्भर होने के साथ-साथ दुनिया में अपने लिए एक ऐसा स्थान भी बना पाते जो हमें रोजगार और आर्थिक लाभ देने के साथ ही प्रतिष्ठा और गौरवान्वित भी करता। लगता है, देश वर्ष 1947 में अंग्रेजों की गुलामी से जरूर आजाद हुआ, लेकिन हम आज भी अंग्रेजी दवाइयों की गुलामी से मुक्त नहीं हुए हैं।  हमसे बेहतर तो ईरान रहा जिसने हमारी आयुर्वेद औषधियों का अपने यहां के 200 करोना संक्रमित पीड़ितों पर प्रयोग किया और उनमें से 190 को तुरंत राहत मिली और शेष 10 लोगों को कुछ दिनों के बाद लाभ मिला। अब भी समय है, भारत सरकार इस दिशा में तेजी से अपने कदम उठाएं और देश में करोना से पीड़ित लोगों पर आयुर्वेद की दवाओं का इस्तेमाल करें।
 
आयुर्वेद औषधियां कितनी प्रभावी है, इसके लिए क्षय रोग जिसे अंग्रेजी में टीबी कहा जाता है, उसके उदाहरण से भली-भांति समझा जा सकता है। कोरोनावायरस एक व्यक्ति से दो व्यक्तियों को संक्रमित करता है। जबकि टीबी पीड़ित व्यक्ति 14 व्यक्तियों को संक्रमित कर सकता है। यानी करोना से 7 गुना अधिक मारक क्षमता है टीवी के बैक्टीरिया की। लेकिन, आपने कभी क्षय रोग विशेषज्ञ और चिकित्सा कर्मियों को ऐसा कोई लबादा पहने और मास्क लगाए हुए नहीं देखा होगा जैसा कि हम अब कोरोना वायरस के इलाज के समय चिकित्सकों या चिकित्सा कर्मियों को पहने हुए देखते हैं।
 
यह भी एक विचारणीय विषय है कि इस लबादेनुमा व्यक्तिगत संरक्षण उपकरण ( पीपीई ) पर जो खर्च किया जा रहा है, क्या वह वास्तव में उचित है ? या जनता के धन को भय के व्यापार के नाम पर लुटाया या लूटा जा रहा है। दुनिया में कोरोना महामारी अभी पैदा हुई है। लेकिन, क्षय रोग काफी पुराना रोग है। इस रोग पर अनेक शोधों के बाद इस रोग की अंग्रेजी दवा और इसका निवारण खोजा गया है। इसके बावजूद भी देश में हर साल साढ़े चार लाख और दुनिया में 15 लाख से अधिक लोग क्षय रोग से मृत्यु को प्राप्त होते हैं। तब तो यह माना जाना चाहिए कि अंग्रेजी दवा कारगर नहीं है। इसके बावजूद भी हम उन्हीं का अनुसरण कर रहे हैं।
 
नागपुर के एक क्षय रोग विशेषज्ञ डॉ के बी टुमने ने पीड़ितों पर हल्दी का प्रयोग किया। हल्दी के सेवन से मात्र 14 दिनों में ही पीड़ित व्यक्तियों का बुखार दूर हो गया। इससे प्रभावित होकर एलोपैथिक चिकित्सक ने अंग्रेजी दवा लिखना ही बंद कर दिया। वे रोगियों को सुबह - शाम एक गिलास गुनगुने पानी में पांच ग्राम पिसी हल्दी के सेवन की ही सलाह देते। इसके चमत्कारिक परिणाम मिले। करोना संक्रमित रोगियों पर भी यदि हल्दी जैसी अन्य औषधियों  का उपयोग किया जाए तो निश्चित ही इस महामारी का सहजता से मुकाबला किया जा सकता है।