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कोरोना वायरस: महामारी है या जैविक युद्ध की तैयारी !!
March 20, 2020 • तहलका ब्यूरो • लेख
 
मधुप्रकाश लड्ढा
 
                   पिछले दिनों चीन से शुरू हुई "कोरोना वायरस" की आपदा ने पूरे विश्व में धमाल मचाना शुरू कर दिया है। "कोरोना वायरस" को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एक महामारी के रूप में माना है। केंद्र और राज्य की सरकारों ने इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए संघठन द्वारा जारी की गई एडवाइजरी पर कार्य करना शुरू कर दिया है। धैर्य और शांति के साथ ही इस आपदा का निवारण सम्भव है।
 लेकिन प्रश्न यह है कि कोरोना वायरस उत्पन्न हुआ कैसे ? इस बारे में तरह तरह के कयास लगाए जा रहें हैं तो कोई जीव जंतुओं को जिंदा खाने वाले मांसाहारी लोगों को सबसे ज्यादा दोषी माना जा रहा है।
माना जा रहा है कि मांसाहार, जीवित और बेजुबां जीवों के भक्षण ने प्रकृति को असंतुलित कर दिया है। हो सकता है किसी हद तक यह बात सही भी हो लेकिन बात कुछ और भी है, वरना विश्व के इतने बड़े देशों में इतना ख़ौफ़ पहले कभी नहीं देखा गया। 
आणविक और परमाणविक हथियारों के बाद विश्व की महा शक्तियों में रायायनिक और जैविक हथियारों को पाने की होड़ मानवता को इस कदर निचोड़ देगी किसी ने सोचा नहीं होगा !!
कोरोना वायरस कहीं इन्हीं जैविक हथियारों का अंश तो नहीं है ? 
अगर ऐसा है तो प्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन की भविष्यवाणी सत्य साबित होते देर नहीं लगेगी की "तीसरे युद्ध का तो मालूम नहीं लेकिन चौथा विश्वयुद्ध पत्थरों और डंडों से लड़ा जाएगा"। मतलब साफ है कि तीसरा विश्वयुद्ध जैविक हथियारों से लड़ा जाएगा जिसमें पूरी मानव सभ्यता का सर्वनाश सम्भव है।
चीन और अमेरिका का शीत युद्ध जगजाहिर है। दोनों एक दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाते हैं और बात जब वर्चस्व के साथ अर्थ की आ जाए तो सब्र की सीमाएं अपने आप ही सरहद लांघ जाती है। 
सभी महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा किसी से छिपी नहीं है। कोरोना वायरस भी इसी का परिणाम हो सकता है। आने वाले समय में क्या होगा ? किसी को नहीं मालूम लेकिन पूरी मानव जाति बर्बादी के मुहाने पर खड़ी है यह जरूर एहसास हो गया है। ऐसा महसूस होता है कि प्रमुख देशों के राष्ट्राध्यक्ष और प्रधानमंत्रियों को कोरोना के पीछे की कहानी मालूम तो है लेकिन कोई बताना नहीं चाहता, कारण स्पष्ट है की कहीं जनता में डर और भगदड़ नहीं मच जाए। 
कल्पना कीजिये कि आपके पास जिंदगी के सिर्फ दस दिन ही बचे हैं, तब हर वो कार्य याद आएगा जो आपने अधूरा छोड़ दिया था लेकिन समय है जो रेत की तरह हाथों से फिसल रहा है। मौका अच्छा है उन तमाम गलतियों का प्रायश्चित कर लीजिए और साथ ही जीवनदान मिलने पर दोबारा नहीं करने का संकल्प भी ले लीजिए। संकल्प लीजिए कि बच जाओ तो मानवता और प्रकृति के नियमों का पालन करेंगे।
भारत में दो ऋतुओं के मिलन के समय को संधिकाल कहते हैं। इसीलिए शरद ऋतु के उत्तरार्ध और ग्रीष्म ऋतु के पूर्वार्ध का यह काल भी संधिकाल कहलाता है जिसमें व्यक्ति शारीरिक रूप से सुस्त और निढाल सा होता है तो दूसरी तरफ व्यक्ति के शरीर के अंदर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी कम हो जाती है। यही कारण है इस सन्धिकाल में मानव शरीर में जीवाणुओं का हमला तीव्र होता है। पिछले कई वर्षों से हम इसी संधिकाल के दौरान ही अलग अलग तरह के वायरस जैसे इबोला, हेपिटाइटिस, रैबीज, डेंगू से दो दो हाथ होते रहे हैं। ऐसा क्यों हो रहा है और कौन कर रहा है ? यह भी शोध का विषय है। लेकिन इस बार दहशत का माहौल कुछ अलग ही है जिंदगी थम सी गई है... बस अपने अपने ईष्ट से शुभ होने की प्रार्थना कीजिये। अगर अनिष्ट ही होना लिखा है तो जल्दी ही जीवन और जीवन मूल्यों की परिभाषा भी समझ में आ जाएगी। 
जो होना है वो तो होकर ही रहेगा लेकिन आने वाले कुछ दिन तो आप अपने घर पर परिवार के साथ सुकून से बिताइए। हो सकता है यह समझाने के लिए ही प्रकृति आपके साथ खेल खेल रही हो.....।।
 
ये लेखक के निजी विचार हैं।