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परशुराम जयंती विशेष: सत्य के धारक भगवान परशुराम
April 23, 2020 • तहलका ब्यूरो • लेख

हरकिशन भारद्वाज

"परशु " प्रतीक है पराक्रम का। "राम"  पर्याय है सत्य सनातन का । इस प्रकार परशुराम का अर्थ हुआ - "पराक्रम के कारक और सत्य के धारक " । भगवान परशुराम विष्णु के छठे अवतार हैं । "परशु " में भगवान शिव समाहित हैं और राम में भगवान विष्णु ।इसलिए परशुराम अवतार भले ही विष्णु के, हों  , किंतु व्यवहार में समन्वित स्वरूप शिव और विष्णु का है।   भगवान परशुराम शिवहरि हैं। पिता जमदग्नि और माता रेणुका ने तो अपने पांचवें पुत्र का नाम राम ही रखा था लेकिन तपस्या के बल पर भगवान शिव को प्रसन्न करके उनके दिव्य अस्त्र "परशु " प्राप्त करने के कारण वे राम से परशुराम हो गए।  

"शस्त्र " से ध्वनित होती है "शक्ति "। "शास्त्र " से प्रतिबिंबित होती है "शांति"। "शस्त्र " की शक्ति यानी  "संहार "। "शास्त्र " की शांति अर्थात "संस्कार "। मेरे मत में परशुराम दरअसल "परशु " के रूप में "शस्त्र " और "राम" के रूप में "शास्त्र " का प्रतीक हैं । एक वाक्य में कहूं तो परशुराम  -  " शस्त्र और शास्त्र के समन्वय का 
नाम है। " संतुलन जिसका पैगाम है । 

अक्षय तृतीया को जन्मे हैं इसलिए परशुराम की शस्त्र शक्ति भी अक्षय है और शास्त्र संपदा भी अनंत हैं। विश्वकर्मा के अभिमंत्रित दो दिव्य धनुष की प्रत्यंचा पर केवल परशुराम ही वाण चढ़ा सकते थे। यह उनकी अक्षय शक्ति का प्रतीक था। पिता जमदग्नि की आज्ञा से अपनी माता रेणुका का उन्होंने वध किया । यह पढ़कर , सुनकर हम अचकचा जाते हैं , अनमने हो जाते हैं । लेकिन उनके मूल में छिपे रहस्य को / सत्य को जानने की कोशिश नहीं करते । यह तो स्वाभाविक बात है कि कोई भी पुत्र अपने पिता के आदेश पर अपनी माता का वध नहीं करेगा फिर परशुराम ने ऐसा क्यों किया ? इस प्रश्न का उत्तर हमें  परशुराम के परशु में नहीं। परशुराम के राम में मिलता है।  आलेख के आरंभ में ही राम की व्याख्या करते हुए कहा जा चुका है कि राम पर्याय है सत्य , सनातन का ।

सत्य का अर्थ है  - सदा नैतिक। सत्य का अभिप्राय है  - दिव्यता। सत्य का आशय है - सतत, सात्विक सत्ता। परशुराम दरअसल राम के रूप में सत्य के संस्करण हैं - अर्थात नैतिक युक्ति का अवतरण हैं। यह परशुराम का तेज, ओज और शौर्य ही था, कि सहस्त्रार्जुन का वध कर के उन्होंने अराजकता समाप्त की तथा नैतिकता और न्याय का ध्वजारोहण किया। परशुराम का क्रोध  मेरे मत में रचनात्मक क्रोध है। मेरा यह भी मत है कि परशुराम ने अन्याय का संहार और न्याय का सृजन किया। जिस समय इस धरती पर क्षत्रिय नरेशों का अत्याचार बड़ा हुआ था, तो भगवान श्री परशुराम, धर्म की रक्षा करते हुए, उन आतताइयो का सफाया किया।  ऐसा उल्लेख है कि आपने 21 बार इस धरा को क्षत्रिय विहीन किया। भगवान परशुराम ने जितनी बार भी धरा को आतताइयों से मुक्त किया। किंतु सत्ता को उन्होनें अपने अधीन न रख कर दान कर दिया।  

भगवान परशुराम चिरंजीव हैं। भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य और  महारथी कर्ण तीनों के शस्त्र गुरु भगवान परशुराम जी थे । भगवान कृष्ण को सुदर्शन चक्र भी परशुराम जी ने ही दिया था। भगवान परशुराम को व्यक्तिगत हित की अपेक्षा राष्ट्रहित सर्वोपरि था। उनके व्यवहार का एक और पक्ष सामने आता है की, वे जितने कठोर थे, उतने ही कोमल हृदय भी थे। वे किसी कि करुण व्यथा से द्रवित भी हो जाते थे। अन्याय और अत्याचार के विरोधी भगवान परशुराम विशिष्ट व्यक्तित्व के स्वामी थे। 
 
अक्षय तृतीया का महत्व
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन जो भी शुभ कार्य किए जाते हैं उनका अक्षय फल मिलता है। इस दिन शुभ कार्य करने का विशेष महत्व  है ।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन पंचांग तक देखने की कोई आवश्यकता नहीं । अक्षय तृतीया के दिन गृहस्थ लोगों को अपने धन, वैभव में अक्षय बढ़ोतरी करने के लिए अपनी कमाई का कुछ हिस्सा धार्मिक कार्यों के लिए दान करना चाहिए। अक्षय तृतीया के दिन भगवान विष्णु  की उपासना के साथ भगवान परशुराम जी की  पूजा करने का विधान बताया गया है । इस  दिन ही सतयुग और त्रेता युग की शुरुआत हुई थी और अक्षय तृतीया पर ही मां गंगा का धरती पर आगमन हुआ । धार्मिक मान्यताओं के अनुसार - इस दिन किया गया कोई भी काम निष्फल नहीं होता। लेकिन इस बार कोरोना के भंवरजाल में फड़फड़ाती जिंदगी के चलते हम सभी अपने-अपने घरों में पूजा अर्चना करें और रात्रि को 11 दीपको की दीप माला के साथ भगवान परशुराम जी की जयंती को हर्ष और उल्लास के साथ मनाएंगे।